Хинди Медицина
06.07.2026 Читать источник
Наблюдения подтверждают пользу масляного массажа пупка для улучшения пищеварения и снижения стресса
Исследования показывают, что стимуляция пупка с помощью масел повышает уровень пищеварительных ферментов и улучшает микрофлору кишечника. Эксперты рекомендуют эту древнюю практику как вспомогательный метод для облегчения запоров, газов и снятия напряжения.
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भारतीय घरों में दादी-नानी या घर के बुजुर्ग अक्सर नाभि में तेल लगाने की बात कहते हैं। क्या आपको मालूम हैं कि नाभि में तेल लगाने से हमारी पाचन क्रिया दुरुस्त होती है और पेट फूलने, गैस, अपच, कब्ज व पेट दर्द जैसी समस्याओं से भी आराम मिलता है। आयुर्वेदाचार्य से जानते हैं कि नाभि में तेल लगाने के क्या फायदे होते हैं और किस तरह से इस प्रक्रिया को करना चाहिए।
आयुर्वेद में नाभि को शरीर का महत्वपूर्ण केंद्र माना गया है। आयुर्वेद के मुताबिक नाभि और उसके आसपास हल्की तेल मालिश करने से पित्त दोष को शांत करने, त्वचा को पोषण देने और शरीर को आराम पहुंचाने में सहायता मिल सकती है। यही वजह है कि हम अक्सर घर के बुजुर्गों से नाभि में तेल लगाने की बात सुनते आए हैं। आयुर्वेद और मर्म शास्त्र इस हिस्से को कई समस्याओं के इलाज और ऊर्जा के नजरिए से महत्वपूर्ण मानते हैं। वे इसे एक ऐसा जरूरी केंद्र मानते हैं जो शरीर की जीवन-शक्ति, ताकत और प्राण-शक्ति में तालमेल बैठाता है। डॉ. काव्या (असिस्टेंट प्रोफेसर, कौमारभृत्य विभाग, एसडीएम कॉलेज ऑफ आयुर्वेद, उडुपी) कहती हैं कि नाभि के जरिए तेल पूरे शरीर में औषधीय प्रभाव पैदा करता है। इसलिए इसे एक सहायक वेलनेस प्रैक्टिस के रूप में अपनाया जा सकता है। साथ ही, नाभि के हिस्से को उत्तेजित करने से पूरे शरीर के कार्यों में संतुलन बनाने में भी मदद मिलती है, जिससे व्यक्ति का समग्र स्वास्थ्य धीरे-धीरे बेहतर होने लगता है।
नाभि में कौन से तेल की मालिश करें और उनके क्या फायदे होते हैं?
आयुर्वेद में नाभि और उसके आस-पास के हिस्से पर अलग-अलग तेलों से मालिश करने या तेल लगाना फायदेमंद माना जाता है। डॉक्टर के अनुसार व्यक्ति की बीमारी के प्रकार, गंभीरता, व्यक्ति की उम्र और समय या मौसम के आधार पर नाभि में तेल लगाने के क्लिनिकल तरीकों में कई तरह के बदलाव किए जाते हैं। आगे जानते हैं कि नाभि में कौन से तेल का उपयोग करना चाहिए और उनके क्या फायदे होते हैं।
कैस्टर ऑयल का उपयोग
नाभि में कैस्टर ऑयल लगाने के फायदे (Designed By Magnific)
आयुर्वेद में पित्त दोष से जुड़े गैस्ट्राइटिस के लक्षणों, जैसे सीने में जलन, खट्टी डकार, जी मिचलाना (उल्टी जैसा महसूस होना) आदि में व्यक्ति को अरंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) नाभि पर लगाने की सलाह दी जाती है। कैस्टर ऑयल से पित्त दोष कम होता है, जिसे पाचन जूस के स्राव की मात्रा और गुणवत्ता से जुड़ी समस्या कम होती है। यह नाभि अभ्यंग या नाभि की मालिश के रूप में एक सरल अभ्यास है जिसे किसी भी उम्र के लोग कर सकते हैं।
अदरक या सौंफ के तेल का उपयोग
पाचन शक्ति बढ़ाने के लिए आप अदरक या सौंफ का तेल उपयोग कर सकते हैं। पेट फूलने की समस्या वाले बच्चों में सादे या औषधीय घी से मालिश करना भी असरदार पाया गया है। इसके लिए, नाभि में पर्याप्त मात्रा में (इतनी मात्रा कि नाभि भर जाए) घी डालें और फिर उसमें एक उंगली डालें। इसके बाद चुटकी काटने जैसी मालिश करें। कुछ चिकित्सक तेल/घी लगाने के बाद पूरे पेट और नाभि वाले हिस्से पर हल्का गर्म पान का पत्ता रखकर सिकाई भी करते हैं। इससे दर्द और आंतों में जमा गैस से तुरंत राहत मिलती है और पाचन में सुधार होता है। यह पेट के मरोड़ (कोलिक) और ऐंठन के कारण पेट फूलने की समस्या में भी उपयोगी है।
महानारायण या क्षीरबला तेल
पित्त दोष की गंभीर और पुरानी समस्या होने पर पीठ के बल लेटे हुए मरीज की नाभि में हल्का गर्म औषधीय तेल बूंद-बूंद करके तब तक डाला जाता है जब तक नाभि भर न जाए, इस दौरान तेल के न गिरने का खास ध्यान रखा जाता है। मरीज को बिना हिले-डुले लेटे रहने की सलाह दी जाती है। इसमें महानारायण तेल, क्षीरबला तेल आदि का इस्तेमाल किया जाता है। अगर पित्त दोष अधिक हो, तो घी का इस्तेमाल किया जा सकता है और इसे 30 से 45 मिनट तक नाभि में रहने दिया जाता है।
आयुर्वेद में नाभि में तेल लगाने के लिए क्या प्रक्रिया की जाती हैं?
नाभि में तेल लगाने की प्रक्रिया और फायदे (Designed By Magnific)
नाभि अभ्यंग या नाभि की मालिश
इस प्रक्रिया में आयुर्वेदाचार्य व्यक्ति को कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल), सरसों का तेल, अदरक और सौंफ का तेल, घी, महानारायण और क्षीरबला तेल उपयोग करने की सलाह देते हैं। इसमें व्यक्ति को पीठ के बल लेटाकर उसकी नाभि में थोड़ी मात्रा में तेल भरा जाता है या मालिश की जाती है। इस प्रैक्टिस को आप घर पर भी कर सकते हैं।
नाभि बस्ती (नाभि में तेल भरकर रखने की थेरेपी)
'बस्ती' शब्द असल में 'वसति' शब्द से बना है, जिसका मतलब है 'जो टिका रहे'। यह 'नाभि पूरण' का ही एक एडवांस रूप है, जिसमें पीठ के बल लेटकर नाभि के हिस्से में एक खास तरह के घेरे (फ्रेम) के अंदर गर्म औषधीय तेल भरकर रखा जाता है। इसके लिए उड़द की दाल के आटे में सही मात्रा में पानी मिलाकर एक गाढ़ा आटा (dough) तैयार किया जाता है। इससे लगभग 15-20 cm व्यास, 3 cm मोटाई और 5 cm ऊंचाई वाला एक गोल घेरा बनाया जाता है, जिसके अंदर पिघला हुआ तेल या घी जरूरत के हिसाब से 10 से 30 मिनट या उससे भी अधिक समय तक भरा रहता है। इलाज की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, गर्म पानी में भीगे और निचोड़े हुए सूती कपड़े से हल्की सिकाई की जाती है। जब दवा को लंबे समय तक नाभि में बनाए रखा जाता है, तो दवा न केवल संपर्क से बल्कि दबाव से भी असर करती है। इसलिए, यह दस्त, इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS), अपच, गैस्ट्राइटिस, बिना सर्जरी वाली अम्बिलिकल हर्निया, पेट में बिना सूजन वाला दर्द, कब्ज आदि में अच्छे फायदे देती है। लेकिन नाभि वाले हिस्से में अचानक सूजन या घाव जैसी स्थितियों में यह खास थेरेपी नहीं अपनानी चाहिए।
नाभि में तेल मालिश के फायदे
पैंक्रियाटिक एंजाइम्स का बढ़ना
कई वैज्ञानिक सबूतों से पता चला है कि आम लोगों में नाभि को स्टिमुलेट करने (तेल लगाने या भरने) के एक ही सेशन के बाद छोटी आंत में पैंक्रियाटिक एंजाइम का लेवल बढ़ जाता है। जो पेट से जुड़ी समस्याओं को कम करता है।
हेल्दी गट बैक्टीरिया को बढ़ाने में सहायक
नाभि में तेल लगाने से कुछ स्टडीज में गट-ब्रेन एक्सिस (आंत और दिमाग के बीच संबंध) में बदलाव देखा गया है, जो इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) से जुड़ा है। इन नतीजों से माइक्रोबियल में थोड़ी बढ़ोतरी और बाइफिडोबैक्टीरियम और लैक्टोबैसिलस जैसे पेट के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया की सोलह किस्मों पर सकारात्मक असर का पता चला है। बेहतर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल पेरिस्टालसिस (आंतों की गति) और लोकल इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रियाओं में अन्य संभावित बदलावों के कारण माइक्रोबायोटा में ऐसे बदलाव हो सकते हैं।
भोजन को पचाने में सहायक
नाभि के ठीक ऊपर पेट के हिस्से की मालिश करने से नर्वस सिस्टम की कई ऐच्छिक या अनैच्छिक गतिविधियां नियंत्रित होती हैं और शरीर की स्थिति में बदलाव आता है, जिससे पाचन में मदद मिलती है। नाभि के आसपास के हिस्से में बहुत सारी रक्त वाहिकाएं और नसों के कनेक्शन होते हैं। इसलिए, यहां की जाने वाली प्रक्रियाएं नसों को गट पेप्टाइड्स और हार्मोन छोड़ने के लिए प्रेरित करती हैं, जो पाचन क्रिया को नियंत्रित करने में शामिल होते हैं।
मानसिक और तनाव कम करने वाले प्रभाव
नाभि में तेल लगाने और साधारण मालिश करने की नियमित और ध्यानपूर्ण प्रक्रिया तनाव को कम कर सकती है और व्यक्ति को आराम महसूस करने में मदद कर सकती है।
जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करें
अदरक के तेल और अरंडी के तेल का नियमित या जरूरत के अनुसार इस्तेमाल से जोड़ों के दर्द और सूजन की गंभीरता कम होने, मासिक धर्म के दौरान ऐंठन कम होने और मासिक धर्म चक्र को नियमित करने में मदद मिली है। इसलिए, इस थेरेपी और इसके तरीकों में आंतों की सेहत को बेहतर बनाने और शरीर की अन्य बीमारियों को नियंत्रित करने की अच्छी संभावना है।
नाभि में तेल मालिश करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
बहुत ज्यादा गर्म तेल का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इससे जलने का खतरा हो सकता है और थेरेपी रोकनी पड़ सकती है।
सही तेल या घी चुनने के लिए किसी योग्य डॉक्टर से सलाह लें।
बच्चों के लिए यह थेरेपी बहुत फायदेमंद होती है, लेकिन बच्चों को लंबे समय तक यह थेरेपी नहीं दी जानी चाहिए।
जिन बच्चों को डिहाइड्रेशन (पानी की कमी), तेज बुखार या कोई गंभीर बीमारी हो, उन्हें तेल वाली थेरेपी नहीं देनी चाहिए। चूंकि इलाज लक्षणों और दोषों के असंतुलन के आधार पर हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है, इसलिए खुद से इलाज करने की सलाह नहीं दी जाती है।
नाभि में तेल लगाना आयुर्वेद की एक पारंपरिक स्व-देखभाल पद्धति है, जो त्वचा की नमी बनाए रखने और हल्के रिलैक्सेशन में मदद कर सकती है। नाभि में तेल लगाने को स्वस्थ जीवनशैली का एक पूरक उपाय माना जाना चाहिए, न कि चिकित्सा उपचार का विकल्प। यदि कोई स्वास्थ्य समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो आप डॉक्टर या आयुर्वेदाचार्य से संपर्क कर सकते हैं।
हमने इस लेख की समीक्षा कैसे की
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Jun 29, 2026, 03:26 PMMedically Reviewed byDr. Kavya
Jun 29, 2026, 03:26 PMWritten byVikas Arya
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